Nirmohi
निर्गुण निर्मोही सब तूने मोहि बना दिया शून्य गहरे अँधेरे में प्रेम से दीपक जला दिया। धागे अब मोह के ये बंधते ही जा रहे है दुनिया के पाश में हम फसते ही जा रहे है। पर सोचते है ये हम भी गर एहसास ही ना होता धरती न प्यारी होती अम्बर ना गहरा होता। एहसास है तभी तो गीत सुनते है तुम्हारे महकती है सारी बगिया खिलते है चाँद तारे। जब दर्द ये मिला है तभी मरहम पता चला है अंधियारे के बिना तो वजूद दिये का भी क्या है? खुलके बरस रहा है वह प्रेम है तुम्हारा चाहे प्रकाश कह लो चाहे कहो ओमकारा।